Aryabhatt ka jivan Parichay | आर्यभट्ट का जीवन परिचय हिंदी में

नमस्कार दोस्तों आज की इस पोस्ट में आप Aryabhatt ka jivan Parichay और उनके गणित में योगदान के बारे में वो भी हिंदी में जानेगे आर्यभट्ट जो की भारत के महान गणितज्ञों और खगोल वैज्ञानिकों में से एक माना जाता है

उनके जन्म के समय भारत एक सवतंत्र देश नहीं था फिर भी वो राजाओं के शासन के उथल-पुथल और युद्धों से प्रभावित नहीं हुए और आपने काम को जारी रखा

अंत उन्होंने अपनी महेनत से खगोल विज्ञान ओर गणित के कई सिद्धांतों का प्रीतपादन किया तो चलिए जानते है आर्यभट्ट का जीवन परिचय हिंदी में

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आर्यभट्ट का जीवन परिचय | Aryabhatt ka Jivan Parichay

जन्म और माता पिता –

आज से लगभग 1600 साल पहले आर्यभट्ट का जन्म 476 ईस्वी को पाटलिपुत्र में हुआ था जो की इस समय पटना, बिहार में है

उन्होंने एक किताब आर्यभटिय की रचना की थी जिसमे उन्होंने बताया है की वो पाटीलिपुत्र के निवासी थे और जब तक वो 23 साल के हुए

तो कलयुग के 3600 साल निकाल गए थे जिससे हमे ये पता चलता है की जिस समय उन्होंने उस कितब की रचना की तो वो समय 449 ईस्वी था उस कितब की रचना करने से 23 साल पहले ही उनका जन्म हुआ था


नाम आर्यभट्ट
जन्म 476 ईस्वी
पिता जानकारी नहीं
माता जानकारी नहीं
जन्म स्थान पाटलिपुत्र
रचनाए आर्य- सिद्धांत और आर्यभटिय
कार्य क्षेत्र (profession)खगोल वैज्ञानिक ओर गणितज्ञ
उम्र 74 बर्ष
मृत्यु समय 550 ईस्वी
मुख्य खोज कार्य शून्य एवम पाई का मान

आर्यभट्ट की शिक्षा –

उनकी शिक्षा को लेकर ऐसा माना जाता है की उनकी शिक्षा पाटीलिपुत्र में ही हुई थी ओर वो पाटीलिपुत्र के एक शिक्षण संस्थान के मुख्य अध्यक्ष भी रहे थे कुछ इतिहासकारों का मानना है की वो नालंदा विश्वविद्यालय के अध्यक्ष भी रहे थे

आर्यभट्ट का ग्रंथ –

आर्यभट्ट ने 23 साल की उम्र में आर्यभाटीय ग्रंथ की रचना की थी जिसमे उन्होंने अपनी सारी खोज कार्यों का वर्णन किया है इस ग्रंथ का नाम उन्होंने कई भी नहीं लिखा है

लेकिन उनके शिष्य ओर अन्य लोग इसे आर्यभाटीय ग्रंथ कहते है इसके इलावा भी उन्होंने कई अन्य ग्रंथों की भी रचना की जो निम्नलिखित है

  • दशगीतिक
  • तंत्र
  • आर्यभट्ट सिद्धांत

ऐसा माना जाता है की आर्यभट्ट सिद्धांत का प्रयोग सातवी सदी में हुआ करता था लेकिन इस सिद्धांत के बारे में बहुत से मतभेद है

संप्रति में इस ग्रंथ 34 श्लोक ही उपलब्द है ये ग्रंथ लुप्त कैसे हो गया इस विषय में इतिहासकारों के पास कोई जानकारी नहीं है

ग्रंथ को लिखने में छंद/पद्य तरीके का इस्तमाल किया गया है जो इसे पढ़ने में थोड़ा-सा कठिन बना देता है।

इसमें कुल 108 छंद/पद्य हैं तथा 13 अन्य परिचयात्मक छंद है इसके शूरवाती 13 छंदों में आर्यभट्ट ने आपने जीवन तथा ग्रंथ के बारे में बताया हुआ है ग्रंथ में कुल 4 अध्याय है जिन्हे पद कहा गया है जो की निम्नलिखित है

  • गीतिपाद
  • गणितपाद
  • कलक्रियापद
  • गोलपाद
  • आर्य – सिद्धांत

इन अध्यायों को आप नीचे दिए गए Table के माध्यम से समझ सकते है

अध्याय का नामछंद की संख्याअध्याय सामग्री
गीतिकापद13समय के मापन की इकाइयां – युग, ज्या की सारणी,कल्प, मनवंत्र
गणितपद33शंकु छाया, साधारण, द्विघाती,मापन, अंकगणित, ज्यामिति, तथा अनिश्चित समीकरणों के हल
कलाक्रियापद25ग्रहों की स्थिति,क्षया तिथि, मापन व उनकी इकाइयां,7 दिनों का सप्ताह तथा सप्ताह के 7 दिन इत्यादि
गोलापद50पृथ्वी की आकृति, भूमध्य रेखा,त्रिकोणमिति, गोला, दिन रात होने का कारण, ग्रहण व नक्षत्र

आयरभट्ट की खोज (Aryabhatt ka jivan Parichay) –

आर्यभट्ट ने आपने जीवन काल में मुख्य रूप से खगोल विज्ञान और गणित में कार्य किया कई खोजे की उनकी सभी खोजे आर्यभटिय नामक ग्रंथ में उपलब्द है जिनमे से प्रमुख खोज कार्य निम्नलिखित है

  • आर्यभटीय, भाग – कलाक्रियापद, गोला पद, गीतिकापद, गणितपद
  • पाई का मान
  • शून्य की उत्पत्ति
  • चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण का ज्ञान
  • नक्षत्र काल
  • अंकगणित
  • आर्य सिद्धांत
  • अनिश्चित समीकरणों के हल
  • बीजगणितीय सूत्रों का प्रतिपादन
  • त्रिकोणमिति व ज्या-कोज्या का प्रतिपादन
  • ग्रहों की गति के सिद्धांत

आर्यभट्ट का जीवन परिचय और गणित में योगदान | Aryabhatta ka Jivan Parichay

शून्य की उत्पति –

संख्याओं को आगे बढ़ाने के लिए तथा एक पूर्ण गणना करने के लिए उन्होंने एक दशमलव का उपयोग किया

जीसे उन्होंने शून्य का नाम दिया उन्होंने संख्याओं को बराबर आकार देने के लिए इसकी आकृति बदलकर एक वृत्त की तरह बना दिया

आज जो हम गणित में शून्य का इस्तमाल करते है वो आर्यभट्ट की ही विज्ञान को देन है जो उनके समय से ही चल रहा है  

पाई का मान –

आर्यभटीय ग्रंथ के दूसरे अध्याय के दसवें छंद में आर्यभट्ट ने पाई का मान बताया है इसके लिए उन्होंने सबसे पहले एक वर्त्त के व्यास का एक निक्षित मान रखा

जो 20,000 था उन्होंने इसमे बताया की यदि आप 100 में 4 जोड़कर फिर उसे 8 से गुना कर देंगे तो जो भी प्राप्त परिणाम होगा

उसमे एक बार फिर से 62000 जोड़ दिए जाए तो जो अंतिम में परिणाम आएगा उसे व्यास यानि 20000 से विभाजित कर दिया जाए तो आपके पास जो परिणाम आएगा वो ही पाई का मान होगा जो की 3.1416 आता है

For example – [ (4 + 100) * 8 + 62,000] / 20,000 = 62,832

 62832/ 20,000 = 3.1416

जो वर्तमान समय के पाई के मान के 3 दशमलव तक सत्य है इसकी गणना उन्होंने आपने ग्रंथ में करके दिखाई है

कुछ गणितज्ञों का मानना है की उन्होंने पाई को अपरिमेय संख्या बताया है परंतु उनके ग्रंथ में इसका कोई सबूत न होने के कारन उन्हे इस तथ्य का कोई श्रेय नहीं मिला था

लैंबर्ट ने 1761 में पाई को अपरिमेय संख्या बताया था जिसके कारन उसे इस तथ्य का श्रेय  मिला आर्यभट्ट के ग्रंथों को आज से हजारों साल पहले कई अन्य भाषाओ में अनुवादित किया गया था

जिनमे पाई को अपरिमेय संख्या लिखा गया था जिससे पता चलता है की संभवत आर्यभट्ट ने पाई को अपरिमेय संख्या लिखा था

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बीजगणित व समीकरणें 

भारत के प्राचीन गणितज्ञ हमेशा ही समीकरणों के अनिक्षित चरों का मान निकालने में बहुत ही रुचिकर रहे है

चरों वाली साधारण समीकरणों का हल निकालने के लिए आर्यभट्ट ने कुटुक सिद्धांत का प्रीतपादन किया

जो की बाद में मानक सिद्धांत बन गया उस समय उन्होंने इस सिद्धांत का प्रयोग ax+by=c जैसी समीकरणों का हल प्राप्त किया

उन्होंने सर्वप्रथम त्रिकोणमिति के ज्या तथा कोज्या फलनों की रचना की थी उनके ग्रंथों को अरब भाषा में बदलते समय अनुवादको ने इन शब्दों को जैया (Jaiya) तथा कौज्या (Kojaiya) में बदल दिया। 

जब उनको लैटिन भाषा में अनुवादित किया गया तो इनको स्थानिक शब्दों साइन और कोसाइन में बदल दिया गया जिससे यह पता चलता है की आर्यभट्ट ने ही साइन व कोसाइन की रचना की थी

खगोल विज्ञान में आर्यभट्ट के योगदान – Aryabhatt ka jivan Parichay

ग्रहों की गति –

गति की सापेक्षता के बारे में आर्यभट्ट ने बताया था की एक चलती हुई नाव से हमे पेड़ पौधे व अन्य स्थिर चीजे चलती हुई दिखाई देती है उसी तरह ही स्थिर तारे भी पृथ्वी से पशिम की और चलते हुए देखाई देते है

आर्यभट्ट ने 1 हजार बर्ष पहले ही ये बता दिया था की धरती गोल है इसके इलावा उन्होंने बताया की सूर्य, चंद्रमा सभी पृथ्वी के चरों ओर चक्कर लगते है

यह दो ग्रहचक्कर में गति करते हैं जिसे मंद और तेज कहा गया था। उन्होंने सभी ग्रहों को पृथ्वी से दूरी के आधार पर व्यवस्थित किया, जिसका क्रम यह है –

  • चंद्रमा
  • बुध
  • शुक्र
  • सूर्य
  • मंगल
  • बृहस्पति
  • शनि व तारे।

सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण –

आर्यभट्ट ने ही सबसे पहले सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के बारे में बताया था उन्होंने कहा की जब सूर्य और पृथ्वी के बीच में चाँद या जाता है

तो चाँद की परछाई धरती पर पढ़ने लगती है जीसे हम सूर्य ग्रहण कहते है ठीक इसी तरह ही जब चाँद और सूर्य के बीच में धरती या जाती है तो उसकी परछाई चाँद पर पड़ने लगती है जीसे हमे चंद्र ग्रहण कहते है

उन्होंने इन सिद्धांतों को राहू-केतु की मदद से समझाया तथा उन्होंने धरती के आकार की गणना करके ग्रहण के वर्त्त में बनी छाया का मापन भी किया जिससे हमे ये पता चलता है

की वो कितने बुद्धिमान थे इतना ही नहीं आर्यभट्ट को यह भी पता था की चाँद और दूसरे ग्रह सूर्य की किरणों से प्रकाशित होते है

दिन- रात व बर्ष का होना –

आर्यभट्ट की गई समय की गणना और वर्तमान विज्ञानिकों की कई गई समय की गणना में सिर्फ 0.01 सेकंड का अंतर है

आर्यभट्ट ने उस समय में बताया था की धरती आपने अक्ष पर घूमती है जिसमे उसे 23 घंटे 56 मिनट और 4.1 सेकंड का समय लगता है

जबकि वर्तमान वैज्ञानिकों ने बताया है की ये समय 23 घंटे 56 मिनट और 4.09 सेकंड है

इतना ही नहीं उन्होंने ये भी बताया है की धरती को तारों के चारों और अपना एक चक्कर लगाने में कितना समय लगता है

जो की आज के वैज्ञानिकों के गणना के अनुसार मात्र 3 मिनट ही ज्यादा है आर्यभट्ट के मुताबिक धरती को अपना एक चक्कर लगाने में 365 दिन 6 घंटे और 56 मिनट तथा 4.09 सेकंड का समय लगता है

आर्यभट्ट के बारे में कुछ रोचक तथ्य – Aryabhatt ka jivan Parichay

1) आर्यभट्ट ने जिस आर्यभटिय ग्रंथ की रचना की थी उसका प्रयोग आज भी हिन्दू पंचाग के लिए किया जाता है

2) आर्यभात ने न केवल शून्य के रचना की बल्कि उन्होंने सूर्य सिद्धांत की भी रचना की थी

3) आर्यभट्ट का गणितज्ञ ओर खगोल विज्ञान के लिए योगदान को देखते हुए भारत ने प्रथम उपग्रह का नाम उनके ही नाम पर रखा था

4) जब 23 साल की उम्र में आर्यभट्ट ने आर्यभटिय ग्रंथ की रचना की थी तो उनकी उपयोगिता को देखकर उस समय के राजा बुढ़गुप्त ने उन्हे नालंदा विश्वविधालय का प्रमुख अध्यक्ष बना दिया था

5) बिहार के तरेगाना क्षेत्र में आर्यभट्ट ने सूर्य मंदिर में एक निरीक्षण शाला की स्थापना भी की थी

6) आर्यभट्ट ने हमेशा Alphabets का प्रयोग अंकों को दर्शाने के लिए किया उन्होंने कभी भी उस समय की संस्कृतक प्रथा के अनुसार चल रही ब्राह्मण लिपि का प्रयोग नहीं किया

आर्यभट्ट की मृत्यु –

माना जाता है कि आर्यभट्ट की मृत्यु 550 ईस्वी में पाटलिपुत्र में ही हो गई थी आर्यभट्ट भारत के महान वैज्ञानिकों में से एक है लेकिन बड़े ही दुख की बात है

कि आज हमारे शिक्षा प्रणाली में आर्यभट्ट एवं उनके जैसे महान विद्वान रामानुज एवम वराहमिहर भास्करचार्य आदि के विषय में कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता है

FAQ about Aryabhatt ka jivan Parichay

1.आर्यभट्ट ने किसकी खोज की थी

उत्तर – आर्यभट्ट ने आपने जीवन कल में कई रचनाए की उन्मे से सबसे प्रसिद्ध खोज ज़ीरो यानि शून्य की थी

2.आर्यभट्ट का जन्म कब हुआ था

उत्तर- गणित और खगोल विज्ञान के महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट का जन्म आज से 1600 साल पहेले पाटीलिपुत्र में 476 ईस्वी में हुआ था

3.आर्यभट्ट की पत्नी का नाम

उत्तर- आर्यभट्ट की पत्नी के बारे में इतिहासकारों के पास अभी तक कोई निशित जानकारी नहीं है लेकिन ये माना जाता है की आर्यभट्ट की एक पत्नी थी

4.आर्यभट्ट की मृत्यु कब हुई

उत्तर – इतिहासकारों की माने तो आर्यभट्ट की मृत्यु पाटीलिपुत्र में 550 ईस्वी में ही हो गई थी

5.आर्यभट्ट की मृत्यु के समय उनकी आयु कितनी थी

उत्तर – 74 बर्ष


Conclusion-

आशा करते है दोस्तों की अपको हमारी ये पोस्ट Aryabhatt ka jivan Parichay पसंद आई होगी और अपको आर्यभट्ट के जीवन के बारे में जानकारी मिल गई होगी

यदि इस पोस्ट को लेकर आप हमसे कुछ पूछना चाहते है तो कमेन्ट में पूछ सकते है ओर अगर ये पोस्ट अपको पसंद आई हो

तो आपने दोस्तों के साथ इसे जरूर share करे ताकि उन्हे भी भारत के महान गणितज्ञ आर्यभट्ट के बारे में पता चल सके 

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